🌺🌺।।ओ३म्।। 🌺🌺
🙏 08.01.24 वेद वाणी 🙏
अनुवाद महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेंद्र भाटिया द्वारा 🙏🌺
समी रथं न भुरिजोरहेषत दश स्वसारो अदितेरुपस्थ आ।
जिगादुप ज्रयति गोरपीच्यं पदं यदस्य मतुथा अजीजनन्॥ ऋग्वेद ९-७१-५॥🙏🌺
हमारे हाथों की दस उंगलियां जिस प्रकार एक रथ को नियंत्रित करती हैं उसी प्रकार दस इंद्रियां और दस प्राण यदि एक साथ मिलाकर शरीर रूपी रथ को चलाएं तो एक योगी की बौद्धिक जागरूकता बढ़ जाएगी। उसकी क्षमताएं उसे एक साथ मिलकर आनंद के परम चरम पर पहुंचा देंगे।🙏🌺
Just as the ten fingers of our hands control a chariot, in the same way if ten senses and ten vital forces together drive the chariot of the body, then the enlightenment of a yogi will progress. His abilities together will take him to the ultimate bliss.
(Rig Ved 9-71-5)
🙏🌺#vedgsawana 🙏🌺

