💐💐 ।।ओ३म्।। 💐💐
🙏 6.04.24 वेद वाणी🙏
अनुवाद महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेंद्र भाटिया द्वारा 🙏💐
होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्ययज्ञस्य केतुं रुशन्तम्।
प्रत्यर्धिं देवस्यदेवस्य मह्ना श्रिया त्वग्निमतिथिं जनानाम्॥ ऋग्वेद १०-१-५॥🙏💐
प्रभु अग्नि है अर्थात अग्रणी है। सब आवश्यक पदार्थ को प्रदान करने वाले प्रभु का हम स्तवन करते हैं। जब हम शरीर रूपी रथ को प्रभु से अधिष्ठित कर देते हैं तो काम वासनाओं पर नियंत्रण आ जाता है और हम हिंसा रहित उत्तम कर्म करते हैं। अपनी शक्तियों के विकास के लिए हमें पांच प्राण, ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों की शक्ति को विकसित करके पंच्चजन बनना चाहिए। 🙏💐
God is Agni, i.e., leading. We praise the Lord, who provides all the essential substances. When we dedicate the chariot of our body to God, then our lust comes under control, and we perform good deeds without violence. For the development of our powers, we should develop the power of the five Pranas—sense organs and motor organs—and become Panchajan.(Rig Ved 10-1-5)
🙏💐#vedgsawana🙏💐

