💐💐 ।।ओ३म्।। 💐💐
🙏 09.03.24 वेद वाणी,🙏
अनुवाद महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेंद्र भाटिया द्वारा 🙏💐
आ जामिरत्के अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः।
सरज्जारो न योषणां वरो न योनिमासदम्॥ ऋग्वेद ९-१०१-१४॥🙏💐
जिस प्रकार एक बालक अपने माता-पिता की गोद में सुरक्षा और प्रसन्नता का अनुभव करता है। जिस प्रकार एक प्रेमी प्रेमिका के पास प्रसन्न होकर जाता है। जिस प्रकार एक दूल्हा विवाह की वेदी पर प्रसन्न होकर बैठता है। उसी प्रकार सोम अपने पसंदीदा स्थान प्रेम में स्थित होकर प्रसन्न होता है।🙏💐
Just as a child feels security and happiness in the lap of his parents, Just as a lover goes to his beloved happily, Just as a groom sits happily at the wedding altar, Similarly, Soma becomes happy by being situated in his favorite place, love.
(Rig Ved 9-101-14)
🙏💐#vedgsawana 🙏💐

