🌹🌹 ।।ओ३म्।।🌹🌹
🙏 24.03.24 वेद वाणी🙏
अनुवाद महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेंद्र भाटिया द्वारा 🙏🌹
येना नवग्वो दध्यङ्ङपोर्णुते येन विप्रास आपिरे।
देवानां सुम्ने अमृतस्य चारुणो येन श्रवांस्यानशुः॥ ऋग्वेद ९-१०८-४॥🙏🌹
सोम आत्मज्ञान की वह भावना है जिसके द्वारा योगी देवत्व के पथ पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं। ऐसे सिद्ध संतों की संगत दूसरे मनुष्यों को भी देवत्व के आनंद भरे पथ पर चलने के लिए प्रेरित करती है।🙏🌹
Som is the feeling of self-realization through which the Yogi attains salvation by walking on the path of divinity. The company of such accomplished saints inspires other human beings to walk on the blissful path of divinity.(Rig Ved 9-108-4)
🙏🌹#vedgsawana🙏🌹

