🌸🌸 ।।ओ३म्।। 🌸🌸
🙏 20.02.24 वेद वाणी 🙏
अनुवाद महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेंद्र भाटिया द्वारा 🙏🌸
द्विता व्यूर्ण्वन्नमृतस्य धाम स्वर्विदे भुवनानि प्रथन्त।
धियः पिन्वानाः स्वसरे न गाव ऋतायन्तीरभि वावश्र इन्दुम्॥ ऋग्वेद ९-९४-२॥🙏🌸
दिव्य दृष्टि वाला मनुष्य इस संसार से आगे की सोच रखता है उसे भौतिक और आध्यात्मिक दोनों खजाने को खोजना होता है। उसकी इंद्रियां यज्ञ की इच्छा करती हैं। ऐसा जिज्ञासु मनुष्य परमेश्वर को पाने की इच्छा करता है।🙏🌸
A person with divine vision thinks beyond this world and has to search for both material and spiritual treasures. His Indriyan desire Yajna. Such a curious person looks for an interface with God.(Rig Ved 9-94-2)
🙏🌸#vedgsawana 🙏🌸

