🏵️🏵️ ।।ओ३म्।। 🏵️🏵️
🙏 04.01.24 वेद वाणी 🙏
अनुवाद महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेंद्र भाटिया द्वारा 🙏🏵️
उपो मतिः पृच्यते सिच्यते मधु मन्द्राजनी चोदते अन्तरासनि।
पवमानः संतनिः प्रघ्नतामिव मधुमान्द्रप्सः परि वारमर्षति॥ ऋग्वेद ९-६९-२॥🙏🏵️
जब एक उपासक अपनी बुद्धि को देवत्व से संयुक्त करता है तो पवित्र दिव्यता का प्रवाह अंतकरण में होने लगता है। जिव्हा दिव्य आनंद में होकर मधुर शब्द बोलने लगती है। परमात्मा सर्व व्यापक है। एक सच्चा उपासक उसे अपने अंदर भी अनुभव करता है।🙏🏵️
When a worshiper connects his intellect with divinity, sacred divinity begins to flow into his conscience. The tongue starts speaking sweet words in divine bliss. God is omnipresent. A true worshiper experiences it within himself also.
(Rig Veda 9-69-2)
🙏🏵️ #vedgsawana🙏🏵️

